Saturday, March 31, 2012

Dalit medical student attempts suicide for failing repeatedly


Friday, March 30, 2012


घर में रोटी नहीं इसलिए बेचते हैं बेटियां

shadi
वाराणसी। दामाद का नाम क्या है? साहब नहीं पता। दामाद कहां का रहने वाला है? साहब, दूर किसी जिले का है…। उसका घर-गांव देखे हो? नहीं साहब… उन्होंने खुद आकरतीन रोज पहले लड़की देखी और दूसरे दिन शादी कर ली…। यह तो जानते ही होगे कि किस बिरादरी का है दामाद? नहीं साहब, यह भी नहीं पूछे… हम लोग गरीब हैं… लड़की का ब्याह हो जाए यही बहुत है हमारे लिए…। लड़की देने के एवज में पैसा लिए हो? ज्यादा नहीं साहब, केवल 38 सौ रुपये दिए थे लड़के वालों ने…। बाकी बिचौलिया को दिए होंगे तो हमको नहीं मालूम…।
यह सवाल और जवाब सोमवार दोपहर शिवपुर थाने में एसओ राजकुमार सिंह और उस लड़की निर्मला के मां-बाप के बीच हो रहा था जिसे गरीबी के चलते महज 38 सौ रुपये लेकर बुलंदशहर के अनजान युवक से ब्याह दिया गया। अमर उजाला में सोमवार को खबर छपने पर एसपी सिटी मान सिंह चौहान के आदेश पर एसओ शिवपुर ने पिसौरी गांव की दलित युवती निर्मला के पिता पारस को पूछताछ के लिए बुलाया था। निर्मला से ब्याह रचाने वाले बुलंदशहर में गुलाबडीह इलाके के प्रवीण कुमार जाट को उसके मामा पिंटू समेत शनिवार दोपहर पकड़कर पुलिस के हवाले किया गया था। स्थानीय महिला लालमती सोनकर का आरोप है कि प्रवीण ने बिचौलियों के जरिए शादी के लिए निर्मला को खरीदा था। पैसों के चक्कर में ही निर्मला के गरीब मां-बाप ने बिना कुछ पूछे-जांचे बेटी प्रवीण के हवाले कर दी। इसीलिए उन्होंने प्रवीण को पकड़ा कि पुलिस पता तो लगाए कि वह अपराधी तो नहीं।
थानाध्यक्ष राजकुमार सिंह ने अमर उजाला को बताया कि जांच-पड़ताल से पता चला कि पश्चिमी यूपी और हरियाणा के तमाम जिलों में जाट बिरादरी में लड़कियों की बेहद कमी हो गई है। शादी के लिए युवकों को दूसरे राज्यों में जाकर गरीब लड़कियों के घरवालों से मोलभाव करना पड़ता है। बनारस के भी कई इलाकों में जाट बिरादरी के सैकड़ों युवकों ने बिचौलियों के जरिये गरीब परिवार की लड़कियों से ब्याह रचाया है। यह भी सच है कि ज्यादातर लड़कियां दलित हैं जिनके मां-बाप दो जून की रोटी भी नहीं जुटा पाते तो भला शादी के लिए पैसे कहां से लाएंगे। इसी मजबूरी में वे आंख मूंदकर बेटियों को अनजान युवकों के साथ ब्याह देते हैं। यह अपराध से ज्यादा सामाजिक समस्या है। इसलिए अफसरों से सलाह-मशविरा के बाद पकडे़ गए युवक प्रवीण जाट समेत दोनों लोगों को छोड़ दिया गया।
लड़कियों की कमी से बिचौलियों की चांदी
वाराणसी। पश्चिमी यूपी के बुलंदशहर, हापुड़, अलीगढ़, बागपत, एटा, मेरठ समेत कई जिलों में जाट समेत कुछ बिरादरियों में विवाह योग्य लड़कियों की कमी के कारण पूर्वांचल में सक्रिय बिचौलियों की चांदी है। पकड़े गए प्रवीण जाट ने बताया कि उसके तमाम परिचितों ने बनारस के साथ ही आसपास के भी जिलों की गरीब लड़कियों से शादी की है। बिचौलिए पांच से 20 हजार रुपये लेकर लड़की दिखाते हैं। ये बिचौलिए पश्चिमी यूपी के जिलों में जाते रहते हैं। प्रवीण के मुताबिक, बुलंदशहर में वह सौ से ज्यादा लोगों को जानता हैं जिन्होंने इधर आकर पैसे खर्च किए और ब्याह रचाया।
कर दी शादी, बोझ तो हटा
वाराणसी। अमर उजाला टीम को छानबीन के दौरान शिवपुर और बड़ागांव में ऐसे दर्जन भर परिवारों के बारे में पता चला जिन्होंने अपनी बेटियों को पश्चिमी यूपी और हरियाणा के उन युवकों से ब्याह दिया जिनके बारे में वे कुछ भी नहीं जानते हैं। मामला गर्माने पर इन परिवारों को बदनामी का भय सताने लगा इसलिए उन्होंने नाम तो नहीं बताया अलबत्ता बातचीत में यह जरूर कहा कि वे किसी तरह गरीबी में गुजर-बसर कर रहे हैं। बेटी के ब्याह की चिंता बनी रहती है। बिचौलिए बाहर के लड़के लाते हैं, देखने में ठीक रहते हैं और कुछ पैसे देते हैं तो ब्याह कर देते हैं। सिर से बोझ उतर जाता है।

कीजिए दलित मुक्ति और होइए मालामाल

भारत में जातिप्रथा के खिलाफ दलित आन्दोलन का एक लम्बा इतिहास रहा है. ज्योतिबा फुले जैसे समाज सुधारकों से लेकर रामास्वामी पेरियार और डॉ. भीमराव आंबेडकर जैसे सामाजिक, राजनीतिक सुधारकों तक का एक लम्बा सफ़र रहा है. वर्तमान दलित आन्दोलन ने भी भारत की निचली जातियों को  'शिक्षित बनो, संघर्ष करो' की प्रेरणा दी और इनके आत्मसम्मान को जगाया, लेकिन जाति के सवाल को यह आन्दोलन भी हल नहीं कर पाया. यह दलित आन्दोलन ऐसा कोई भी कार्यक्रम देने में असफल रहा है जो जाति के भौतिक आधार को समाप्त कर इसको जड़ -मूल से मिटा सके.

वर्तमान में तो दलित आन्दोलन जाति की पहचान को समाप्त करने के बजाय जाति की पहचान बनाने पर तुला है. दलित जातिसूचक उपनाम लगाकर स्वयं को गौरवान्वित महसूस कर रहा है. ब्राह्मणवादी देवताओं और संस्कारों का विकल्प भी कुछ इसी तरह दिया जा रहा है. अर्थात इस देवता की जगह दूसरा हमारा देवता, इस ग्रन्थ की जगह हमारा फलां ग्रन्थ और स्वयं को स्वयं ही सामर्थ्य बनाओ. वर्तमान दलित आन्दोलन में अलग- अलग तरह के रुझान दिखाई दे रहे हैं. इसके अलावा वैश्वीकरण, निजीकरण का विरोध करने के बजाये यह उसका समर्थन कर रहा है, जिससे निजीकरण निरंतर आरक्षण को समाप्ति की ओर ले जा रहा है और निजी क्षेत्र में आरक्षण की मांग पर ही दलित आन्दोलन ने खुद को सीमित कर लिया है.  
दूसरी तरफ सत्ता में भागीदारी हो जाने पर तमाम दलित पार्टियाँ और नेता दलित समुदाय के उत्थान के कार्य न करके शोषणकारी, दमनकारी राज्यसत्ता के पक्ष में उसके औजार के रूप में कार्य करते हैं. दलित विरोधी नीतियों के पक्ष में अपना वोट विधानसभाओं एवं संसद में डालते हैं. ये लोग अपने निहित स्वार्थों की पूर्ति के लिए अपनी चल -अचल सम्पति में बढ़ोतरी के आलावा कुछ नहीं करते हैं. एक तरफ दलित समुदाय के बहुसंख्यक हिस्से के पास रोटी, कपड़ा व मकान की भी ठीक से व्यवस्था नहीं है और दूसरी तरफ कई दलित नेता अरबों-खरबों रुपयों में खेलते हैं. उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती की घोषित सम्पति जिसका खुलासा उन्होंने पिछले दिनों राज्यसभा के नामांकन के दौरान हलफनामे में किया. यह 112 करोड़ रुपये है. दूसरे दलित नेता भी एक से बढ़कर एक हैं. चाहे वह रामविलास पासवान हों या कोई अन्य, सभी ने सत्ता में भागीदारी के नाम पर यहाँ के पूंजीपति शासक वर्ग की सेवा की और अपनी चल -अचल सम्पति में बढ़ोतरी की. 
भारत में जातिप्रथा वैदिक काल से प्रारम्भ होकर उत्तरवैदिक काल (लगभग 1000-600 ईसापूर्व ) 3000 वर्ष पूर्व तक काफी हद तक अपना स्वरूप ग्रहण कर चुकी थी. सामंतवाद में बदलने के बाद जातिप्रथा ने और भी ज्यादा मजबूती ग्रहण की. चन्द्रगुप्त मौर्य काल में मनु ने 'मनुस्मृति'  की रचना कर जातिप्रथा को एक व्यवस्थित और वैधानिक रूप दे दिया. समाज में मौजूद जातियों के कर्तव्य एवं अधिकार सुनिश्चित कर दिए गये. ब्राह्मणों को शिक्षा-दीक्षा का कार्य, क्षत्रिय (राजा) को जातिप्रथा के नियमों की सुरक्षा करना और उल्लंघन होने पर दण्डित करना. वैश्य को व्यापार और निचली (शूद्र) जातियों को कृषि क्षेत्र, अन्य उत्पादन के कार्यों एवं ऊपरी सभी जातियों की सेवा करने का कार्य निर्धारित किया गया. उत्तरवैदिक काल के बाद जैसे -जैसे सामंती व्यवस्था और ज्यादा विकसित होती गयी, जातिप्रथा का विस्तार और नियम भी भारतीय उत्पादन प्रणाली के साथ -साथ सामाजिक संस्कारों में निरंतर अपनी जड़ों को गहरा करते चले गये. 
भारत में जो भी विदेशी आक्रमणकारी आये और उन्होंने जितने समय तक यहाँ पर शासन किया जाति व्यवस्था को स्वयं ही अपना लिया. एक तरह से वे उसी में रच -बस गये. केवल ब्रिटिश ही इसका अपवाद रहे. क्योंकि वे भारत की तुलना में काफी उन्नत संस्कृति के लोग थे,  इसलिए यहाँ की जातिप्रथा में तो रचे -बसे नहीं. लेकिन इसको तोड़ने का कार्य भी उन्होंने नहीं किया, बल्कि जाति को इस्तेमाल ही किया. 
ब्रिटिश शासकों के भारत से जाने यानी आज़ादी के बाद वर्ष 1947 में यहाँ के शासक वर्ग  ने सामंती व्यवस्था के साथ समझौता कर जाति व्यवस्था को जानबूझ कर बनाये रखा. उसका वोट बैंक के रूप में खूब इस्तेमाल किया गया. जातिप्रथा के भौतिक आधार कृषि की जमीन को पूर्व सामंती समाज में हुए जाति पर आधारित जमीन के बटवारे को ही बरकरार रखा. यानि कोई भी क्रान्तिकारी भूमि सुधार नहीं किया गया, जिसके चलते सामंतवाद से पूंजीवादी जनतंत्र के रूपांतरण काल में भी जातिप्रथा मजबूती के साथ बनी रही. तमाम संसाधनों से वंचित दलित समुदाय मजदूर में तब्दील हो गया और ऊपरी जातियां सभी संसाधनों की मालिक बन बैठीं. सम्पूर्ण व्यवस्था के संस्थानों में भी उच्च जातियां शीर्ष पर जा बैठी. परिणामस्वरूप आज भी जातिप्रथा भारत की आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक व्यवस्था में मजबूती के साथ अपनी उपस्थिति दर्ज किये हुए है. 
भारत में दलित मुक्ति के सवाल पर ही देशी -विदेशी सरकारों द्वारा अरबों रुपयों की फंडिंग की जा रही है. इस मुल्क के दलित समुदाय का ही एक बुद्धिजीवी तबका दलितों की भलाई व दलित मुक्ति के नाम पर मालामाल हो रहा है. इस तरह वह भी अपनी निजी सम्पति में इजाफा कर रहा है. इस मुल्क का दलित समुदाय वहीं का वहीं है. जैसा कि पूंजीवादी, साम्राज्यवादी राज्यसत्ताएं चाहती हैं कि क्रांतिकारी जनांदोलनों को रोकने के लिए जनता के उत्पीड़ित तबके पर ठन्डे पानी के छींटे मारे जाएँ, वही कार्य ये स्वयंसेवी संस्थायें कर रही हैं. दलित मुक्ति के लिए कार्यक्रम बनाना इनका मकसद नहीं है. यह पूंजीवाद, साम्राज्यवाद के भाड़े के टट्टू हैं. एक सच्चा क्रांतिकारी जाति विरोधी जनआन्दोलन ही इनका भी जवाब हो सकता है. 
सरकारी रिकार्ड के मुताबिक बाईस हजार एनजीओ को वर्ष 2009 -10 के दौरान विदेशों से 10 हजार करोड़ की रकम मिली. इन संगठनों  में 18 एनजीओ तमिलनाडु से सम्बंधित हैं, जिन्हें 1663.31 करोड़ रुपये अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी, ईटली और नीदरलैंड जैसे देशों से मिले. 21508 एनजीओ को 10337.59 करोड़ रुपयों की फंडिंग मिली है. केंद्र शासित प्रदेशों में सबसे ज्यादा विदेशी रकम 1815.19 करोड़ रुपये दिल्ली के एनजीओ को मिले. इसके बाद तमिलनाडु को 1663.31 करोड़ और आंध्र प्रदेश को 1324.87 करोड़ रुपये मिले. जिन जिलों में सबसे ज्यादा विदेशी फंड मिला, उनमें चेन्नई को 871.60 करोड़, बंगलुरु को 702.43 करोड़ और मुंबई को 606. 63 करोड़ रुपये मिले.   
पिछले तीन सालों यानी 2007-2010 के आंकड़ों के मुताबिक एनजीओ को सबसे ज्यादा फंड अमेरिका से मिला. फंडिंग के तौर पर विदेशों से रकम भेजने वालों में सबसे ऊपर गोस्पेल फॉर एशिया इंक 232.71 करोड़ रुपये इसके बाद फ़दाकिओन वीसेट फेरेर, वर्सिलोना, स्पेन 228.60 करोड़ रुपये शामिल हैं. अमेरिका का वर्ल्ड विजन ग्लोबल सेंटर ने एनजीओ को 197.62 करोड़ रुपये दिए. इस विदेशी फंडिंग में अच्छा -खासा हिस्सा दलित मुक्ति के प्रश्न का भी इसी में निहित है. सोसायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट, ट्रस्ट एक्ट आदि के तहत 20 लाख से ज्यादा एनजीओ पंजीकृत  हैं.   
भारत का वामपंथी क्रांतिकारी आन्दोलन भी 70 वर्षों के पुराने इतिहास के बावजूद जाति के सवाल को हल नहीं कर पाया है. वर्गीय संगठनों की लामबंदी के साथ आज आवश्यकता इस बात की है कि जाति के खिलाफ संघर्ष को भी वर्ग संघर्ष का हिस्सा बनाया जाये. दलितों के व्यापक हिस्से की गोलबंदी की जाये और एक ऐसा कार्यक्रम बनना चाहिए जो भारत में जातिप्रथा की कब्र खोद सके, जिससे कि वर्गीय संगठनों के साथ तालमेल करता हुआ यह आन्दोलन भारत में जातिविहीन, वर्गविहीन समाज के निर्माण की दिशा में अपना महत्वपूर्ण योगदान कर सके. भारत का वामपंथी क्रांतिकारी आन्दोलन ही इस सवाल को गंभीरता से हल कर सकता है और भविष्य में जाति विरोधी आन्दोलन को आगे ले जा सकता है.
(यह लेखक के अपने विचार हैं. लेखक जेपी नरेला जाति विरोधी संगठन के संयोजक हैं.)
साभारः जनज्वार

अपने अधिकार से वंचित क्यों हैं आदिवासी

कानून में आदिवासियों के भूमि-अधिकारों की रक्षा की कई व्यवस्थाएं हैं, पर इन सबका उल्लंघन करते हुए बड़े पैमाने पर आदिवासियों की जमीनें छिन रही हैं. भूमि हथियाने वाले अनेक भू-माफिया सक्रिय हैं, जो राजनीतिक व आर्थिक स्तर पर बहुत शक्तिशाली हैं. इसके अतिरिक्त कहीं राष्ट्रीय पार्क, कहीं खनन तो कहीं उद्योग, कहीं शहरीकरण तो कहीं हाईवे व कहीं बड़े बांधों के नाम पर आदिवासियों की जमीनें छिन रही हैं. भू-माफियाओं को पहले ही पता चल जाता है कि कहां हाईवे आदि बनने वाले हैं, वे पहले ही सस्ते दाम पर आदिवासियों की जमीन हथियाने के लिए सक्रिय हो जाते हैं.
कानूनों के उल्लंघन के लिए कई हथकंडे अपनाए जाते हैं. आदिवासियों के नाम पर भूमि खनन के लिए प्राप्त की जाती है. पर वास्तविक खनन बाहर के बड़े सेठ करते हैं. कुछ स्थानों पर बाहरी व्यक्ति आदिवासी युवतियों से विवाह केवल भूमि हथियाने के मकसद से करते हैं. अभ्यारण्य क्षेत्रों में आदिवासी हक पहले भी सीमित किए गए पर अब कुंभलगढ़ में अभ्यारण्य के स्थान पर राष्ट्रीय पार्क बनने से उनकी स्थिति और विकट हो रही है. इस राष्ट्रीय पार्क क्षेत्र में उदयपुर के 23, राजसमंद के 64 व पाली जिले के 41 यानी कुल 128 गांव आ रहे हैं. इस तरह बड़े पैमाने पर विस्थापन का नया खतरा उत्पन्न हो रहा है. जबकि पहले से बने अभ्यारण्यों के निकटवर्ती इलाकों में बाहरी लोग आकर जमीन हथिया रहे हैं. 
सरकार ने आदिवासियों को जमीन पर कब्जा दिलवाने के लिए अभियान चलाए हैं, पर प्रायः मौके पर कब्जा दिलवाया नहीं जाता. मात्र कागज ही दे दिए जाते हैं या सीमा ज्ञान करवा दिया जाता है. जबकि जरूरत इस बात की है कि आदिवासी किसान वास्तव में जमीन पर कब्जा कर उसे जोतना शुरू करे तथा साथ ही उन्हें लघु सिंचाई भी उपलब्ध हो. वर्ष 2006 में आदिवासी वन-अधिकार कानून पास होने पर जो बड़ी उम्मीदें जगी थीं वे सही क्रियान्वयन के अभाव में अब धूमिल होती जा रही हैं. इसकी एक बड़ी वजह यह है कि बहुत से आदिवासियों व अन्य परंपरागत वनवासियों के जायज दावों को भी खारिज कर दिया गया. इस तरह के निर्णय के विरुद्ध यह परिवार समय पर अपील भी नहीं कर सके, क्योंकि उन्हें दावा स्वीकार न करने की सूचना ही नहीं दी गई. 
जो दावे स्वीकार हुए माने गए हैं, उनमें से भी अधिकांश में प्रायः स्वीकृति आधी-अधूरी दी गई है. यदि कोई आदिवासी परिवार पहले पांच बीघा पर खेती कर रहा था व अब उसकी एक बीघा की मान्यता स्वीकार की जाती है तो इसका अर्थ यह है कि चार बीघे से तो उसे हटना पड़ेगा. यदि वह नहीं हटेगा तो फिर पहले जैसी स्थिति ही बन जाएगी कि उसके कब्जे को अवैध माना जाएगा, प्रतिड़ित किया जाएगा या रिश्वत ली जाएगी. आदिवासियों से अलग जो अन्य परंपरागत वनवासी चिन्हित हुए हैं उनके दावे तो लगभग पूरी तरह अस्वीकृत हो रह हैं. कुछ जिलों में अधिकांश दावे अस्वीकृत हो गए हैं. सामूहिक हकदारी संबंधी लगभग सारे दावे अस्वीकृत हो गए हैं. पहले जहां मवेशियों, पशु-पालकों के पशुओं को रहने-चरने का स्थान मिल जाता था अब उन स्थानों पर वन विभाग दीवार बनाकर सामूहिक हकदारी को समाप्त कर रहा है. 
प्रायः कानून की मूल भावना का उल्लंघन हो रहा है. ग्राम सभा को अपेक्षाकृत कम महत्व दिया जा रहा है. जनजातीय विभाग की अपेक्षा वन विभाग अधिक हावी हो गया है. जबकि कानून में वन विभाग को निर्णायक भूमिका नहीं दी गई है. सवाल यह है कि जिस कानून से आदिवासी व वन वासी समुदायों को अपनी किसानी सुधारने की बड़ी उम्मीद थी, यदि उसके अनुचित क्रियान्वयन से अनेक परिवारों व समुदायों की स्थिति और बिगड़ जाए तो इससे आदिवासियों में असंतोष कितना बढ़ सकता है. अतः यह बहुत जरूरी है कि आदिवासियों के भूमि अधिकारों व आजीविका रक्षा संबंधी अन्य कानूनों का मजबूती से पालन किया जाए. जैसा कि हाल में आयोजित एक जन सुनवाई में कई वक्ताओं ने कहा कि यदि मौजूदा कानूनों को ही उनकी सही भावना के अनुकूल लागू कर दिया जाए तो इससे आदिवासियों के भूमि अधिकारों व आजीविका की रक्षा काफी हद तक हो सकती है.
साभारः दैनिक भास्कर

दलित ने पानी पिया तो हाथ काट दिया - FacenFacts Hindi

दलित ने पानी पिया तो हाथ काट दिया - FacenFacts Hindi

दलित ने पानी पिया तो हाथ काट दिया
चंडीगढ:  हरियाणा के हिसार के दौलतपुर गांव में दलित जाति होने के कारण एक युवक को पानी पीने की कीमत हाथ कटवाकर चुकानी पडी। मामला छुआछुत का है। गांव में एक किसान के बेटे ने अपने खेत में रखे मटके से पानी पीने पर एक दलित युवक का दरांती से हाथ काट दिया।

इसके बाद दलित युवका को अस्पताल में भर्ती कराया गया। पीडित राजेश फतेहाबाद जिले के गांव सनियाणा गांव का रहने वाला है। उसके चाचा राजू ने बताया कि राजेश गांव के ही ठेकेदार के पास कपास की लकडी काटने का काम करता है।
बुधवार सुबह करीब नौ बजे वो दौलतपुर गांव में काम करने के लिए गया था। राजू ने बताया कि सुबह दस बजे काम करते हुए वह पास के ही एक खेत में रखे मटके से पानी पीने चला गया। इसी दौरान एक युवक उसके पास आया।

आरोप है कि उस युवक ने राजेश से जाति पूछी और उसके ये बताते ही कि वो हरिजन है, युवक ने साइकिल में लगी दरांत से उसके हाथ पर हमला कर दिया।

Tuesday, March 27, 2012


भंवर मेघवंशी
दलितों पर अत्याचार के ऐसे कई मामले राजस्थान में अक्सर उजागर होते रहते है, जहां पर कृषि के काम में आने वाले टेªक्टर दलितों को कुचलने व रोंदने के काम आ रहे है, पाली जिले की जैतारण तहसील के बेडकलां गांव के जागरूक अम्बेडकरवादी कार्यकर्ता मोहन मेघवाल की शहादत को हम नहीं भूले है, उसे गांव के ठाकुर की मर्जी के खिलाफ चुनाव लड़ने की सजा गांव के चैराहे पर सरेआम चाकुओं से गोंद कर मार कर दी गई तथा उसकी लाश को टेªक्टर से रोंदा गया। बाड़मेर में खेजड़याली गांव के भील परिवार पर वहां के सांमतों द्वारा टेªक्टर चढ़ाकर माने को प्रयास किया गया। ब्रजक्षेत्र में मजदूरी मांगने पर एक गुर्जर सरपंच ने लक्ष्मण सिंह को बांधकर घसीटा, जिससे उसके दोनों पांव कटवाने पड़े, ऐसी अनगिनत घटनाएं है जहां कृषि तकनीक के ये यंत्र एग्रीकल्चर के काम नहीं बल्कि दलितों पर चढ़ज्ञने के काम आ रहे है। अपेक्षाकृत विकसित माने जा रहे सीकर में भी एक दलित व्यवसायी को मारा पीटा गया है और उसके पिता को बोलेरो से कुचल कर मारने की कोशिश की गई है।
अत्याचार और दलित दमन की खबरें विगत दो सालों से राजस्थान के शेखावाटी अंचल से भी आ रही है। शेखावाटी अंचल जिसमें सीकर, झुंझनू तथा चुरू जैसे उन्नत व विकसित माने जाने वाले जिले आते है, शिक्षा, सम्पन्नता और सामाजिक समता के मामलों में पूरे राजस्थान में इस इलाके की मिसाल दी जाती है, कहा जाता है कि यही अकेला इलाका है जहां पर सभी समुदायों ने कई दशकों पहले मृत्युभोज, बाल विवाह जैसी सामाजिक बुराईयों पर विजय पा ली थी और छुआछूत व भेदभाव तथा दलित उत्पीड़न जैसे मामले इस क्षेत्र में नही ंके बराबर है मगर सीकर में पिछले साल जो घटना घटित हुई उससे तो लगता है कि अब शेखावटी भी दलित अत्याचार के मामलों में राजस्थान के अन्य अंचलों से होड़ करने को तैयार है। घटनाक्रम के मुताबिक-‘‘सीकर जिले का दातारामगढ़ क्षेत्र के सुरेरा गांव के निवासी दलित व्यवसायी भंवरलाल मेघवाल की इलेक्ट्रोनिक्स की दूकान के बाहर 29 जुलाई 2011 को दोपहर तकरीबन डेढ़ बजे एक बोलेरो आकर रूकी, जिसमें से निकटवर्ती रघुनाथपुरा, निवासी गोपाल गुर्जर व विरमाराम गुर्जर तथा उनके गुर्जर ने दलित व्यवसायी, भंवरलाल मेघवाल से रिमोट और दो सेल मांगे तथा भंवर मेघवाल को जातिगत गांलिया देने लगे, यह कहकर मारपीट शुरू कर दी-साले, नीच, तूने दुकान कैसे कर ली ? उन्होंने लूटपाट भी की, गल्ले में रखे 18 हजार भी निकाल लिये। उन्हें तो बहाना चाहिये था, कुल मिलाकर दलित व्यवसायी की आर्थिक व सामाजिक रूप से कमर तोड़नी थी। इतना ही नहीं, दरिदंगी की हद तो यह हुई कि भंवरलाल मेघवाल को बचाने आये उनके पिता ईश्वर मेघवाल पर भी हमला किया गया, उन्हें जीप से टक्कर लगाकर मारने की कोशिश की गई। ईश्वर मेघवाल ने हिम्मत करके बोलेरो जीप के बम्पर को पकड़ लिया और बोनट पर चढ़ गये, नही ंतो मार डाले जाते। इसके बाद गोपाल गुर्जर व अन्य आरोपी ईश्वर लाल को बोनट पर बांध कर 35 किलोमीटर दूर मोतीपुरा गांव में नेमाराम मावलिया के खेत में ले गये तथा गले में रस्सी का फंदा लगाकर गला घोंटने लगे। अपने पिता के अपहरण और अचानक हुये इस हमले से सन्न दलित व्यवसायी ने पुलिस को खबर की और अन्य  ग्रामीणों को भी अपने साथ हुई हिसंा व पिता के अपहरण की जानकारी दी, आक्रोशित ग्रामीण और पुलिस ढूंढते हुये पहुंची। वहां ईश्वर मेघवाल के गले में फांसी लगाई हुई थी, लेकिन वह जिन्दा था। पुलिस व ग्रामीणों ने ईश्वर मेघवाल को मुक्त करवाया। घटना के विरोध में दातारामगढ़ क्षेत्र के जागरूक दलितों ने थाने के बाहर प्रदर्शन कर कार्यवाही की मांग की है। आरोपी इससे पहले 2008 में अपने ही गांव रघुनाथपुरा के महावीर प्रसाद बावरिया नामक दलित को भी ट्रेक्टर के पीछे बांध कर घसीटने का दुस्साहस कर चुके थे, जिसकी थाने बकायदा रिपोर्ट दर्ज है।
हालात यह है कि कहीं मोटरसाईकिल के बांधकर घसीटे जाते है दलित, कभी जीप, कारों से कुचले जाते है तो कभी टेªक्टर से रौंद दिये जाते है, जैसे कि राजस्थान के दलित इंसान नहीं बल्कि कीडे़ मकौड़े है, जिन्हें कभी भी, कहीं भी मसल कर खत्म किया जा सकता है। भले ही शेखावाटी क्षेत्र में शिक्षा व समृद्धि बढ़ी है, गांव गांव तक तकनीक फैली है मगर लोगों की मानसिकता में अभी बदलाव नहीं आया है, पहले घोड़ो व हाथियों से रौंदें जाते थे दलित और आज वे टेªक्टर, कार, ट्रक व बोलेरो से रौंदे जा रहे है।
राजस्थान में आज भी हालात इतने बदतर है कि दलित दुकान नहीं लगा सकते है, वे नौकरी कर लेते है और पदौन्नती पाते है तो उसमें आरक्षण राजस्थान के गैर दलितों को बर्दाश्त नहीं है, अच्छे कपड़े पहनते है तो पिटते है, अपने ही घर के बाहर खटिया पर बैठ जाये तो गांव से निष्कासित होते है, अपने बच्चों के सुन्दर नाम रख लेने पर पाली जिले के जाडन के चुन्नीलाल की तरह उन्हें भी मारा जा सकता है, उनके अच्छे घर उनके लिये आफत बन सकते है, कई दलित लाशें अपने लिये श्मशान ढंूढती घूम रही है और ज्यादातर दलित जिन्दा होते हुये भी लाशों की तरह जीवन यापन को मजबूर है, इन्हें आज और अभी, सामाजिक न्याय की दरकार है, इनकी सुनवाई हो, सुनी गई बात पर कार्यवाही हो तथा शिकायत करने पर सुरक्षा हो तभी राजस्थान का दलित सिर उठाकर स्वाभिमान से जी पायेगा अन्यथा हर क्षण, हर पला, हर तरह से वह कुचला ही जाता रहेगा।

Monday, March 26, 2012

मैं और मेरा समाज  

आज एक कहानी पढ़ी. एक राहगीर अपने रास्ते जा रहा था. उसने देखा एक बड़ा सा हाथी एक पतली सी डोरी द्वारा एक खूंटी से बंधा खड़ा था. वो कोई भी विरोध या उत्पात नहीं कर रहा था. ये देख कर राहगीर को बड़ा आश्चर्य हुआ. उसने उस हाथी के मालिक से पूछा कि इतनी पतली डोर से हाथी बंधा है तुमने, क्या ये भाग नहीं जाएगा. ये डोरी तोडना तो इसके लिए बहुत ही आसन है. इस बात पर उस हाथी का मालिक हंसा और बोला "नहीं ये नहीं भागेगा, मुझे ये पक्का विश्वाश है!". राहगीर बहुत ही अचम्भे में था. हाथी का मालिक बोला जानते हो ये हाथी जब बहुत छोटा था तब से मैंने इसे इसी डोरी से बांधना शुरू किया था. पहिली बार इसने बहुत कोशिश की इसे तोड़ने की पर उस वक्त ये बहुत छोटा था और ताकत भी कम थी, इसलिए ये उसे तोड़ न सका. उसके बाद भी लम्बे समय तक इसने प्रयास किया पर नहीं तोड़ पाया. फिर उसके बाद हर मान कर इसने प्रयास करना ही बंद कर दिया. तब से ये शारीरिक रूप से तो बढ़ रहा है पर इसकी मानसिक शक्ति बहुत कमजोर हो गयी है. अब इसे ये पतली सी डोर भी बड़ी शक्तिशाली लगती है. इसलिए ये इसी से बंधा रहता है और कोई विरोध नहीं करता. राहगीर की शंका का समाधान हो गया और वो हंस कर आगे बढ़ गया.


ये कहानी जान कर मुझे उस हाथी में और अपने इस दलित समाज में ज्यादा कुछ अंतर समझ में नहीं आया. वर्षो पहिले अपने अधिकारों के हनन और अपनी शक्तियों के दमन का इतना गहरा असर इस पर अब तक है की ये अपनी शक्ति तो नहीं पहिचान पा रहा है. आज जब दलित समाज एक बड़े समुदाय में तब्दील हो चुका है फिर भी ये अपनी शक्ति से अनभिज्ञ है. आज जरूरत है इसे अपनी शक्तियों के सही इस्तेमाल की, जरूरत है उसे सही दिशा देने की और अपने आप को प्रेरित करने की कि अब वो कमजोर नहीं है और उसमे शक्ति है समाज का नेतृत्व करने की. वो भी अपने इस भारत देश की अखंडता और संप्रभुता में बराबर का भागीदार है. 

अपने दलित समाज में अगर मैं ये जाग्रति ला सका तो शायद अपने डाक्टर बाबा साहेब अम्बेडकर जी के उपकारों का कुछ अंश उन्हें वापस दे सकूं. ये ब्लॉग "दलित जागरण" सिर्फ एक शुरुआत है पर मेरी ये आशा है कि हमारा समाज जल्द ही अपनी सोच में सकारात्मक बदलाव लायेगा और हम ये गर्व से कह सकेंगे कि हाँ हम दलित हैं पर वो दलित जो भारत की विकास के सबसे बड़े भागीदार हैं. ये कल्पना मेरा विश्वाश है और ये तब तक जारी रहेगा जब तक मेरा समाज का एक भी व्यक्ति जीवित है.

                                                                                                                                                                                                   ---------------   डाक्टर बाबा साहेब अम्बेडकर जी का एक अनुयायी

Saturday, March 24, 2012


Invigilators strip two Dalit girls in exam hall


The humiliation occurred in front of 40 male students
In a shocking incident, two teenage Dalit girls were humiliated and stripped by women invigilators in front of 40 boys during a class X State board examination in Madhya Pradesh's Narsinghpur district.
The girls, both aged 15 and appearing for their first board exams, were made to undergo the humiliation during an inspection on cheating on March 15 at the government higher secondary school in Barhebara village.
Invigilators Preeti Sharma and Reshma Semaiya, acting on the suspicion that the girls were hiding pieces of paper to cheat during their mathematics exam, asked them to strip. When the girls refused, the invigilator duo themselves reportedly stripped the two girls in the presence of the boys and some other girl students.
Nothing, however, was found on the girls to prove the charge.
Out of shame, the girls did not inform anyone about the incident until Friday, when they broke down before their parents, who complained to the district administration.

BHOPAL, March 24, 2012  (from "The Hindu")